अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो,--------

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं।
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है
यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकर
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकर
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!















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fight for Eunuchs

fight for Eunuchs
third gender equality

इनके जज्बे के आगे हारी दुश्वारी---

10:54 AM / Posted by huda / comments (0)

कुछ अलग करने की ललक, समाज को कुछ देने की जिम्मेदारी ने इन्हें खास बना लिया। सरकारी तंत्र से जूझते समय तमाम दिक्कतें आई मगर उन्होंने अपना अटल इरादा नहीं बदला। परिवर्तन चाहते थे, दिक्कतें आई मगर सफलता भी मिली ़ ़ ़यही परिवर्तन उनकी सफलता की कहानी कहता है। बात चाहें किन्नरों के लिए अलग पहचान दिलाने की हो या ग्राम्य विकास के लिए खुद को समर्पित करने की। उन्होंने कभी खुद को कमजोर साबित नहीं होने दिया। आइटीआइ के जरिए सरकारी तंत्र को अहसास दिलाना कि कि जनता मालिक जबाव मांग सकती है ़ ़ ़यह काम भी बखूबी हुआ। एक खास सामाजिक जिम्मेदारी, गर्भ में पल रही कन्याओं को बचाने की ़ ़ ़इसकी भी सकारात्मक पहल हो चुकी है, शहर वाले जागे हैं।


सात साल से आइटीआइ के जरिए किन्नरों को हक दिलाने की कोशिश में लगे डा. एसई हुदा को इस साल सफलता मिली। उनके प्रयासों के बाद किन्नरों को जनगणना में अलग कालम मिल सका। इससे पहले किन्नरों को पुरुषों में गिना जाता था। डा.हुदा ने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी। राष्ट्रपति, गृहमंत्री, चुनाव आयोग से लेकर योजना आयोग कार्यालय तक अपनी मांग को उठाते रहे। अंतत: सफलता मिली और भारत एशिया का पहला देश बना जहां किन्नरों को जनगणना में अलग स्थान दिया गया। यूआइडी कार्ड में भी किन्नरों के लिए अलग कालम तय कराने के लिए उन्होंने मुहिम छेड़ी और इसमें भी सफलता मिली।